नए नियमों को लेकर RTI कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों में रोष; कहा- पारदर्शिता की जगह बढ़ेगा नियंत्रण और नागरिकों पर आर्थिक बोझ
मुंबई, प्रतिनिधि
महाराष्ट्र सरकार द्वारा 12 जून 2026 को अधिसूचित किए गए “महाराष्ट्र माहिती अधिकार नियम, 2026” को लेकर राज्यभर में तीखी बहस शुरू हो गई है। सूचना का अधिकार (RTI) आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता, पत्रकार, सामाजिक संगठन और जागरूक नागरिक इन नियमों को सूचना अधिकार कानून की मूल भावना के विपरीत बताते हुए गंभीर आपत्तियां जता रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिन प्रावधानों के माध्यम से नागरिकों को सरकार और प्रशासन से जवाब मांगने का अधिकार मिला था, उन्हीं अधिकारों को अब अधिक जटिल, महंगा और सीमित बनाने का प्रयास किया जा रहा है। यही कारण है कि नया प्रश्न खड़ा हो गया है—”क्या यह सूचना का अधिकार है या सूचना पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश?”
लोकतंत्र का सबसे मजबूत हथियार है RTI वर्ष 2005 में लागू सूचना का अधिकार अधिनियम ने आम नागरिक को सरकारी कार्यप्रणाली पर नजर रखने, भ्रष्टाचार उजागर करने, सार्वजनिक धन के उपयोग का हिसाब मांगने और प्रशासन को जवाबदेह बनाने का संवैधानिक अधिकार दिया। इस कानून ने लाखों लोगों को शासन से सवाल पूछने की ताकत दी और अनेक बड़े घोटालों का पर्दाफाश भी इसी कानून के जरिए संभव हुआ। लेकिन नए नियमों ने इस अधिकार की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
उद्देश्य बताने की अनिवार्यता पर विवाद
नए नियमों के अनुसार आवेदक को सूचना मांगने का कारण अथवा उद्देश्य बताना आवश्यक होगा। RTI कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह प्रावधान सीधे तौर पर सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 6(2) के विपरीत है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कोई भी नागरिक सूचना मांगते समय उसका कारण बताने के लिए बाध्य नहीं है।
कानूनी विशेषज्ञ सवाल उठा रहे हैं कि जब संसद द्वारा पारित मूल कानून में ऐसी कोई शर्त नहीं है, तो राज्य सरकार नियमों के माध्यम से अतिरिक्त बाध्यता कैसे लागू कर सकती है?
एक विषय, एक आवेदन की शर्त भी विवादों में नियमों में RTI आवेदन को केवल एक विषय तक सीमित रखने की व्यवस्था की गई है। हालांकि व्यवहारिक स्तर पर यह प्रावधान नागरिकों के लिए नई परेशानियां खड़ी कर सकता है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई बार अधिकारी एक ही मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं को अलग-अलग विषय बताकर नए आवेदन दाखिल करने के लिए मजबूर करते हैं। इससे नागरिकों को बार-बार आवेदन और शुल्क जमा करना पड़ेगा तथा सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया और कठिन हो जाएगी।
शुल्क में भारी वृद्धि, गरीबों पर बढ़ेगा बोझ
नए नियमों के तहत RTI आवेदन शुल्क ₹10 से बढ़ाकर ₹30 कर दिया गया है। इसके अलावा प्रथम अपील के लिए ₹50 तथा द्वितीय अपील के लिए ₹100 शुल्क निर्धारित किया गया है।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह वृद्धि गरीब, किसान, छात्र, बेरोजगार युवा और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ साबित होगी। उनका तर्क है कि सूचना का अधिकार लोकतंत्र का अधिकार है, कोई प्रीमियम सेवा नहीं जिसे केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोग ही प्राप्त कर सकें।
नागरिकों पर सख्ती, अधिकारियों पर नरमी?
नए नियमों का सबसे अधिक विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि जहां नागरिकों पर अतिरिक्त दस्तावेज, पहचान प्रमाण, उद्देश्य स्पष्ट करने और बढ़े हुए शुल्क का बोझ डाला गया है, वहीं सूचना देने में देरी करने या जानकारी छिपाने वाले अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं किया गया। आज भी अधिकतम दंड सीमा ₹25,000 ही बनी हुई है, जो लगभग दो दशक पहले निर्धारित की गई थी।
RTI कार्यकर्ताओं की प्रमुख मांगें
सूचना अधिकार आंदोलन से जुड़े लोगों ने नियमों में संशोधन की मांग करते हुए कई सुझाव रखे हैं. सूचना देने में विलंब पर दंड ₹250 प्रतिदिन से बढ़ाकर कम से कम ₹2,500 प्रतिदिन किया जाए। अधिकतम दंड सीमा ₹25,000 से बढ़ाकर ₹2,50,000 की जाए।
जानबूझकर सूचना रोकने या गलत जानकारी देने वाले जन सूचना अधिकारियों को तत्काल निलंबित किया जाए।दंड की राशि जमा होने तक संबंधित अधिकारी का वेतन रोका जाए।द्वितीय अपीलों के निपटारे के लिए अधिकतम 60 दिनों की कानूनी समय-सीमा तय की जाए।
लाखों लंबित अपीलों से कमजोर पड़ रहा अधिकार सूचना आयोगों में वर्षों से लंबित हजारों अपीलों को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि सूचना कई वर्षों बाद प्राप्त होती है तो उसका महत्व समाप्त हो जाता है। उनका कहना है कि “देर से मिली सूचना, असल में नकार दी गई सूचना के समान होती है।”
न्यायालयी चुनौती की संभावना
कानूनी जानकारों के अनुसार नए नियमों की कुछ शर्तें मूल RTI कानून और संविधान में निहित पारदर्शिता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांतों से टकराती हुई प्रतीत होती हैं। ऐसे में इन नियमों को न्यायालय में चुनौती दिए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
लोकतंत्र के सामने बड़ा सवाल
महाराष्ट्र के नए RTI नियमों ने केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का विवाद नहीं खड़ा किया है, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर भी बहस छेड़ दी है। आज सवाल यह नहीं है कि सूचना का अधिकार कानून कितना पुराना है या नया नियम कितना आधुनिक है। सवाल यह है कि क्या नागरिकों को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार पहले की तरह स्वतंत्र रूप से मिलेगा? सवाल यह है कि पारदर्शिता को मजबूत किया जाएगा या गोपनीयता की नई दीवारें खड़ी की जाएंगी?
और सबसे बड़ा सवाल—
“क्या सूचना का अधिकार जीवित रहेगा, या सूचना पर अधिकार स्थापित करने की कोशिश होगी?
