नवी मुंबई : यह लेख पढ़ने के पूर्वी समझना चाहिए की सनातन किसी भी शोध के तत्व के संबंध में इशारा करता है उसका वैज्ञानिक अक्सर प्रमाण नहीं देता है। अतः यह लेख वैज्ञानिक तथ्यों को आधार बनाकर और सनातन प्रतीक-दृष्टि को दार्शनिक तुलना के रूप में रखते हुए लिखा गया है, ताकि दोनों को जबरन एक-दूसरे का प्रमाण न बनाया जाए।
मनुष्य ने जब पहली बार आकाश की ओर देखा होगा, तब उसके मन में एक ही प्रश्न उठा होगा। इस अनंत विस्तार के पार आखिर है क्या? हजारों वर्षों से ऋषि, दार्शनिक और वैज्ञानिक अपने-अपने साधनों से ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने का प्रयास करते रहे हैं। आज आधुनिक रेडियो खगोल विज्ञान ने अंतरिक्ष में एक ऐसी विलक्षण संरचना खोजी है, जो देखने में खिंचे हुए धनुष और बाण जैसी प्रतीत होती है।
इस दुर्लभ रेडियो गैलेक्सी को वैज्ञानिकों ने RAD-BAARG अर्थात Bow-And-Arrow Radio Galaxy नाम दिया है। इसकी पहचान भारत के RAD@home Astronomy Collaboratory से जुड़े नागरिक-विज्ञान शोध के माध्यम से हुई। यह खोज LOFAR Two-metre Sky Survey—LoTSS DR2—के रेडियो आंकड़ों में की गई। शोध 22 जून 2026 को प्रकाशित हुआ और Monthly Notices of the Royal Astronomical Society: Letters में सामने आया।
वास्तव में क्या मिला है?
समाचारों में कहा जा रहा है कि वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में ‘धनुष-बाण’ खोज लिया। इसका अर्थ यह नहीं कि वहां किसी धातु या पदार्थ से बना वास्तविक धनुष और बाण तैर रहा है। वास्तव में यह एक रेडियो गैलेक्सी की अत्यंत विशाल ब्रह्मांडीय संरचना है, जिसकी रेडियो तरंगों से बनी आकृति धनुष और बाण जैसी दिखाई देती है। इसका वैज्ञानिक नाम RAD J104501.6+352852 है और इसका रेडशिफ्ट z = 0.159 मापा गया है। इसके पश्चिमी भाग में एक संकीर्ण रेडियो जेट लगभग 115 किलोपारसेक दूर एक क्षेत्र में पहुंचता है और फिर पीछे की ओर मुड़ती हुई लगभग 560 किलोपारसेक की विशाल चापाकार संरचना बनाता है। यह दूरी लगभग 18 लाख प्रकाश-वर्ष के बराबर है। दूसरी ओर पूर्वी जेट S-आकार में विकृत होकर लगभग 250 किलोपारसेक तक जाता है और उसके आगे एक धुंधली पूंछ लगभग 600 किलोपारसेक तक फैली दिखाई देती है।
कल्पना कीजिए, जिस ‘धनुष’ की हम चर्चा कर रहे हैं, उसका विस्तार हमारी पूरी आकाशगंगा से कई गुना बड़ा है! अब यह धनुषाकार आकृति बनी कैसे? कारण यह है रेडियो गैलेक्सियों के केंद्र में सामान्यतः एक अतिविशाल कृष्ण विवर होता है। उसके आसपास पदार्थ अत्यंत तीव्र ऊर्जा प्रक्रियाओं से गुजरता है और वहां से प्रकाश की गति के निकट चलने वाले आवेशित कणों तथा चुंबकीय प्लाज्मा के विशाल जेट निकल सकते हैं। RAD-BAARG की संरचना सामान्य रेडियो गैलेक्सियों की तरह सममित नहीं है।
वैज्ञानिकों का मत है कि इसकी मेजबान आकाशगंगा अपने आसपास के विशाल गैलेक्सी-क्लस्टर वातावरण में संभवतः सुपरसोनिक गति से प्रवेश कर रही है। जब कोई वस्तु किसी माध्यम में ध्वनि की गति से अधिक वेग से चलती है, तब उसके आगे एक प्रघाती तरंग बन सकती है। विमान के सुपरसोनिक होने पर बनने वाली प्रभारी तरंग इसका छोटा उदाहरण है। ब्रह्मांडीय स्तर पर इसी प्रकार की घटना से धनुषाकार प्रघात बन सकता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार RAD-BAARG की पश्चिमी विशाल चापाकार रेडियो संरचना संभवतः ऐसे ही धनुषाकार प्रभात जैसे क्षेत्र के निकट रेडियो प्लाज्मा के संपीड़न से संबंधित है। हालांकि शोधपत्र इसे अंतिम सिद्ध निष्कर्ष नहीं, बल्कि उपलब्ध आकृति और वातावरण के अनुरूप वैज्ञानिक व्याख्या के रूप में प्रस्तुत करता है। इस खोज का एक और अत्यंत प्रेरक पक्ष है। यह केवल किसी विशाल सरकारी वेधशाला में बैठे कुछ वैज्ञानिकों की खोज नहीं है। इसमें नागरिक विज्ञान की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
भारत में 2013 में प्रारंभ हुआ खगोल विज्ञान में नागरिक-विज्ञान शोध का एक मंच है। यहां विज्ञान के विद्यार्थी और प्रशिक्षित नागरिक सार्वजनिक खगोलीय आंकड़ों का अध्ययन कर वास्तविक वैज्ञानिक अनुसंधान में भाग ले सकते हैं। RAD-BAARG की असामान्य आकृति इसी नागरिक-विज्ञान प्रक्रिया में पहचानी गई। यह खोज एक महत्त्वपूर्ण संदेश देती है विज्ञान केवल बड़ी प्रयोगशालाओं की चारदीवारी में बंद नहीं है। प्रशिक्षित मानव दृष्टि आज भी ब्रह्मांडीय आंकड़ों में ऐसी विचित्र संरचनाएं पहचान सकती है, जिन्हें स्वचालित प्रणालियां आसानी से अनदेखा कर सकती हैं।
वैसे RAD-BAARG की खोज यह सिद्ध नहीं करती कि अंतरिक्ष में भगवान श्रीराम का धनुष या अर्जुन का गांडीव मिल गया है। ऐसी घोषणा वैज्ञानिक दृष्टि से अनुचित होगी। परंतु प्रतीकात्मक और दार्शनिक दृष्टि से एक रोचक तुलना अवश्य की जा सकती है। भारतीय चिंतन में धनुष केवल युद्ध का अस्त्र नहीं रहा। वह संचित ऊर्जा, तनाव, दिशा और लक्ष्य का प्रतीक भी है।
मुण्डकोपनिषद् में एक अत्यंत सुंदर धनुष-बाण रूपक मिलता है
प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा, ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं, शरवत्तन्मयो भवेत्॥ अर्थात् प्रणव ‘ॐ’ धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य है। साधक को पूर्ण एकाग्रता से उस लक्ष्य का वेध करना चाहिए और बाण की भांति उसी में तन्मय हो जाना चाहिए।
यहां ऋषि धनुष और बाण के माध्यम से ऊर्जा, दिशा और लक्ष्य की एक वैज्ञानिक-सी प्रतीक व्यवस्था प्रस्तुत करते हैं।
आधुनिक भौतिकी में भी धनुष की डोरी में संचित ऊर्जा को स्थितिज ऊर्जा कहा जाता है। बाण छोड़ने पर वही ऊर्जा गतिज ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है। RAD-BAARG में वास्तविक धनुष नहीं है, किंतु वहां भी हमें गति, प्लाज्मा, चुंबकीय क्षेत्र, जेट, माध्यम का प्रतिरोध और आघात दास जैसी ऊर्जा प्रक्रियाओं का विराट खेल दिखाई देता है। इसलिए समानता प्रतीक की है, प्रमाण की नहीं।
ब्रह्मांड आकृतियां क्यों बनाता है। प्रकृति में कुछ मूलभूत भौतिक नियम बार-बार समान प्रकार की आकृतियां उत्पन्न करते हैं। पानी में चलती नाव के आगे तरंग बनती है। वायु में सुपरसोनिक विमान shock wave बनाता है। सौर पवन किसी ग्रह के चुंबकीय वातावरण से टकराती है तो धनुषाकार आघात बन सकता है। और अब एक विशाल आकाशगंगा के परिवेश में हमें लगभग 560 किलोपारसेक लंबी धनुषाकार रेडियो संरचना दिखाई दे रही है।
पैमाना बदल गया। माध्यम बदल गया। ऊर्जा बदल गई। परंतु प्रकृति के नियम वही रहे। यही विज्ञान का अद्भुत सौंदर्य है।
अगर समझें तो अंतरिक्ष में ‘धनुष-बाण’ की खोज वास्तव में किसी पौराणिक अस्त्र की खोज नहीं, बल्कि एक अत्यंत दुर्लभ Bow-And-Arrow Radio Galaxy की पहचान है। फिर भी यह खोज हमें सोचने पर विवश करती है कि प्रकृति अपने मूलभूत नियमों से सूक्ष्म से विराट तक समान ज्यामितीय और गतिशील संरचनाएं कैसे निर्मित करती है। एक छोटा धनुष अपनी डोरी में ऊर्जा संचित करता है। एक सुपरसोनिक विमान वायु में नाक वेव बनाता है। और लगभग दो अरब प्रकाश-वर्ष दूर एक रेडियो गैलेक्सी ब्रह्मांडीय प्लाज्मा में धनुषाकार प्रघात की विशाल छाप छोड़ती दिखाई देती है। जहां ऋषि ने धनुष में ऊर्जा, दिशा और लक्ष्य का प्रतीक देखा। वैज्ञानिक उसी ब्रह्मांड में जेट, प्लाज्मा और प्रघाती तरंगों की भाषा पढ़ रहा है। दृष्टि अलग हो सकती है, किंतु दोनों की जिज्ञासा का आकाश एक ही है यह विराट ब्रह्मांड।
