युद्ध का पर्यावरिण प्रदूषण प्रभाव विपुल लखनवी,

By: Surendra
Jun 10, 2025
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धरती डूबे रक्त में, रोये नभ और नीर। युद्धों से केवल मिले, मानवता को पीर॥

नवी मुंबई :आज लगभग पूरी दुनिया युद्ध के उन्माद में डूबती जा रही है। वह चाहें भारत पाकिस्तान का 48 घंटे का युद्ध हो अथवा यूक्रेन और रूस का युद्ध हो या फिर इजराइल का फिलिस्तीनों से संघर्ष हो। सभी मानवता के साथ पर्यावरण का विनाश करते जा रहे थे यह चिंता का विषय है। पर्यावरणविद् इसका कोई समाधान नहीं निकाल सकते क्योंकि यह विनाश एक तरफा है।

युद्ध केवल मानव जीवन, संपत्ति और समाज के विनाश तक सीमित नहीं रहता। यह प्रकृति और पर्यावरण पर घातक प्रभाव डालता है। जब युद्ध होता है, तो केवल सैनिक नहीं मरते। उनके साथ मिट्टी, जल, वायु और जीव-जंतु भी दम तोड़ते हैं। आधुनिक युद्धों में प्रयुक्त हथियार, बम, मिसाइल, रसायन और तेल-ईंधन पर्यावरणीय असंतुलन को भयावह स्तर तक ले जाते हैं।

वायु प्रदूषण को देखें तो युद्ध में जलते टैंक, बम धमाके और रसायनिक हथियारों से घातक गैसें वातावरण में फैलती हैं। 1991 के खाड़ी युद्ध के दौरान जब इराक ने कुवैत के तेल कुओं में आग लगाई, तो करोड़ों टन धुआं और कार्बन वातावरण में पहुंचा, जिसने महीनों तक सूर्य की रोशनी को ढंक दिया और "कृत्रिम सर्दी" जैसा वातावरण बना दिया। उन दोनों एक घटना घटी थी जिसको ब्लैक आईज के नाम से जाना जाता है।

जल प्रदूषण में बमबारी और रासायनिक हथियारों के विस्फोट से जल स्रोतों में जहरीले रसायनों का रिसाव होता है। नदियों, झीलों और भूमिगत जलस्रोतों में भारी धातुएँ, रेडियोधर्मी कण और अन्य विषैले पदार्थ मिल जाते हैं, जिससे जल न केवल पीने लायक नहीं रहता, बल्कि जलीय जीवों के लिए भी घातक बन जाता है।

मिट्टी और कृषि पर प्रभाव देखें तो युद्ध में इस्तेमाल हुए बम और हथियार मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर देते हैं। भूमि में जब रेडियोधर्मी कण या रासायनिक तत्व घुल जाते हैं, तो वहां की फसलें जहरीली हो जाती हैं। वियतनाम युद्ध में अमेरिका द्वारा प्रयुक्त ‘एजेंट ऑरेंज’ जैसे रासायनिक हथियारों ने वर्षों तक भूमि को बंजर कर दिया।

वन्य जीवन और जैव विविधता के नाश में युद्ध क्षेत्र में बसे जंगलों को या तो जानबूझकर जलाया जाता है या बमबारी से स्वतः नष्ट हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप हजारों प्रजातियों के जीव-जंतु या तो मारे जाते हैं या पलायन कर जाते हैं। पारिस्थितिक तंत्र (ecosystem) की श्रृंखला टूट जाती है, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव संतुलित पर्यावरण पर पड़ता है। अभी तक वैज्ञानिकों ने कुल 24 पारिस्थितिक तंत्र प्राप्त किए हैं जिनमें हम 14 नष्ट करने के कगार पर है। आप सोंच सकते हैं आने वाला समय कैसा होगा।

रेडियोधर्मी प्रदूषण का कारण तो युद्ध में परमाणु हथियारों का उपयोग होता है, जिनका दुष्प्रभाव दशकों तक बना रहता है हिरोशिमा, नागासाकी में आज भी विकिरणजन्य बीमारियाँ देखी जाती हैं। परमाणु विस्फोट से न केवल मनुष्य मरते हैं, बल्कि मिट्टी, जल और हवा सैकड़ों हजारों वर्षों तक विषैली बनी रहती है।

शरणार्थी संकट और पर्यावरणीय बोझ बढ़ता है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों से विस्थापित जनसंख्या अन्य सुरक्षित क्षेत्रों में जाकर अस्थायी बस्तियाँ बनाती है। इन क्षेत्रों में असंतुलित जनसंख्या वृद्धि से वनों की कटाई, जल की कमी और कचरा-प्रबंधन की समस्याएँ बढ़ती हैं।।

अतः भीषण युद्ध न केवल मानव सभ्यता का, बल्कि प्रकृति का भी विनाश है। यह नदियों को लाल कर देता है, वनों को राख बना देता है और आकाश को धुएं से ढंक देता है। इसलिए विश्व के नेताओं, वैज्ञानिकों और नागरिकों को मिलकर शांति, कूटनीति और पर्यावरण-संरक्षण की दिशा में आगे बढ़ना होगा। युद्ध से किसी का भला नहीं होता न मनुष्य का, न पृथ्वी का। हम जानते हैं हमारी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज है। लेकिन यदि पूरे विश्व के नागरिक एक हो जाए तो युद्ध कभी न हो। अब यह हमको आपको सोचना है हम आने वाली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे।


Surendra

Reporter - Khabre Aaj Bhi

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