To view this video please enable JavaScript, and consider upgrading to a web browser that supports HTML5 video
By: नवनीत मिश्र
उत्तर प्रदेश: सन १९२२ की सर्दियों में असहयोग आंदोलन अपने पूरे चरम पर था। पूरे राष्ट्र में जगह-जगह लोग गाँधी जी के आह्वान पर अपने-अपने तरीके से माँ भारती को पराधीनता से मुक्त कराने में जी जान से लगे थे।
इसीक्रम में ०४ फरवरी सन १९२२ को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरीचौरा में सत्याग्रहियों के एक जूलूस ने २१ सिपाहियों और थानेदार को थाने के भीतर खदेड़ कर थाने में आग के हवाले कर दिया। जिससे सभी २२ पुलिसकर्मी जलकर मर गए। जिसके फलस्वरूप १२ फरवरी १९२२ को गांधी जी ने बारदोली में हुई कांग्रेस की बैठक में असहयोग आन्दोलन को समाप्त करने की घोषणा करते हुए कांग्रेस नेताओं को राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना और नशा निषेध आदि रचनात्मक कार्यों में लगने को कहा।
१९२०-२१ तक गोरखपुर में कांग्रेस का संगठन गांव-गांव तक फैला गया था। यहां विदेशी वस्तुओं की होलियों का तूफान उठ गया था। शहर-शहर ही नहीं गांव-गांव में विदेशी वस्तुओं को स्वयंसेवक घर-घर घूम कर इकठ्ठा करते और लोग खुशी-खुशी उन्हें अपने विदेशी कपड़े व समान देते और तब इनकी होली जलती थी। विदेशी वस्तुओं के दहन में ब्रिटिश हुकूमत का प्रताप स्वाहा होने लगा। तो सरकार ने हुक्म दिया कि विदेशी वस्त्रों की होली जिस तालुका या जमीदार के गांव में होगी, उस पर मुकदमा चलाया जाएगा। इस हुक्म से कांग्रेस और सामंतों में युद्ध छिड़ गया। तालुकेदार व जमीदारों के कारिंदे और गुंडे स्वयंसेवकों को जहां देखते वही पीटते स्वयंसेवकों ने लाठियां खाने और हड्डियां तुड़वाने पर भी उनका उत्साह कम नही हुआ वे अपने काम में लगे रहने की अद्भुत शक्ति का परिचय दिया।
इस बलिदान ने जनता को और उभारा वे और भी जोश से कांग्रेस के साथ आई और जुलूस व जलसों की बाढ़ आ गई। सहजनवां और चौरीचौरा को सत्याग्रह का केंद्र बनाया गया। ताड़ी,शराब, गांजा और विदेशी वस्तुओं की दुकानों पर धरना लग गया। सौ-दो सौ स्वयंसेवक रोज मैदान में उतरते और जमीदारों, तालुकदारो और पुलिस की पिटाई भी बर्दाश्त करते थे। आत्मा की जगी हुई भक्ति ने उनके लिए लाठियों की मार को भी सहज बना दिया। घोड़ों के रिसालों ने घोड़ों की टॉपों स्वयंसेवकों को कुचलना प्रारंभ कर दिया। घायल तो सभी स्वयंसेवक हुए बहुतों के अंग-भंग हो गए।
४ फरवरी १९२२ को विदेशी वस्तुओं के बड़े बाजार चौरीचौरा में सत्याग्रह करने के लिए चार हजार स्वयंसेवक इकट्ठे हो गए। कई जत्थों में बंटकर जुलूस के रूप में वे चले। थाने के सामने से जब शांत जुलूस जा रहा था, तो पुलिस बीच के हिस्से पर टूट पड़ी और लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। पहले तो स्वयंसेवकों ने इसे बर्दाश्त किया। परंतु जो स्वयंसेवक थाने से आगे या पीछे थे वो भी थाने के सामने आ गए। अब पुलिस वाले गोलियां चलाने लगे। पर स्वयंसेवक डटे रहे वे निहत्थे गोलियां खाते रहे और नारे लगाते रहे अहिंसा की शक्ति के अनुपम प्रदर्शन का दृश्य था यह।
पुलिस की गोलियां खत्म हो गई परंतु स्वयं सेवकों का साहस नहीं टूटा। तब वे बंदूकों के कून्दों और संगीनों से स्वयंसेवकों को मारना शुरू कर दिया। कुछ लोग शहीद हो चुके थे, कुछ लोग दम तोड़ रहे थे, कुछ लोगों के कटे अंगों से खून बह रहा था। सभी लोग हिम्मत के साथ खड़े थे। इस दृश्य को देखकर द्वारिका प्रसाद पांडेय जी ने स्वयंसेवकों को ललकारा। इस ललकार से पुलिस वाले थाने के अन्दर भागे और किवाड़ बंद कर लिए। इतने में कोई स्वयंसेवक मिट्टी के तेल का कनस्तर ले आया और उसने थाने में आग लगा दी। २१ सिपाही और एक थानेदार थाने के भीतर जल कर मर गए। जब पुलिसवाले भीतर जल रहे थे तो बाहर २६ शहीद और सैकड़ों घायल स्वयंसेवक पड़े थे।
एक व्यक्ति ने इस घटना के बारे में गांधी जी को अधूरा तार दिया। इसी तार के आधार पर गांधी जी ने आंदोलन स्थगित कर दिया। उसके बाद तो पुलिस ने चौरीचौरा के तीन-चार मील क्षेत्र में तबाही मचा दी। फसलों को जलाया गया। घरों और स्त्रियों की इज्जत लूटी गई। पं०जवाहरलाल नेहरू को चौरीचौरा आने पर अपमानित किया गया। देवदास गांधी आए तो उन्हें पीटा गया और उनकी टोपी उतारकर जूते से मसली गई। बाद में एक साल तक मुकदमा चला। जिसमें १७२ लोगों को फांसी और कुछ को दुसरी सजाएं दी गई।
परंतु महामना मदन मोहन मालवीय जी के अपील करने पर २० को फांसी,१४ को आजन्म कारावास और कुछ को अन्य सजाएं दी गई।
इससे स्पष्ट है कि चौरीचौरा कांड में स्वयंसेवक यूं ही नहीं भड़के थे। वरन वे सहनशीलता की सीमा को पार करने की बाद ही आक्रोशित (अंग्रेजों के दरिंदगी से) होकर कांड किया। जो 'चौरीचौरा कांड' के नाम से स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में जाना गया।
Reporter - Khabre Aaj Bhi
0 followers
0 Subscribers