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नवी मुंबई : "गीतांजलि" टैगोर की बांग्ला कविताओं का अंग्रेज़ी अनुवाद-संग्रह है। जिसे टैगोर ने स्वयं 1912 में इंग्लैंड ले जाकर प्रकाशित किया। ये कविताएँ भक्ति, ईश्वर, आत्मा, त्याग, और मानवीय संवेदना से भरपूर हैं। शैली में बाइबिल जैसे छंदों की गूंज सुनाई देती है। सरल, गद्यात्मक, धार्मिक प्रतीकों से समृद्ध। वैसे इन शिक्षाओं में और श्रीमद्भगवद्गीता के शब्दों में कोई अंतर नहीं दिखता है। टैगोर ने स्वयं कहा था: “मेरी कविताएं ईश्वर की खोज और आत्मा के साथ संवाद हैं।”
इतिहास की मानें तो टैगोर को नोबेल पुरस्कार दिलाने में विलियम बटलर यीट्स, एंड्रयू ब्रैडली, और अन्य ब्रिटिश साहित्यकारों की बड़ी भूमिका थी। यीट्स ने गीतांजलि की प्रस्तावना लिखी और टैगोर को साहित्यिक सभाओं में मंच प्रदान किया। टैगोर उस समय इंग्लैंड में औपनिवेशिक "भद्रलोक" प्रतिनिधि के रूप में देखे जाते थे। यानि एक ऐसा भारतीय जो अंग्रेजों की भाषा, व्यवहार और धर्मनिरपेक्षता के करीब हो। नोबेल समिति टैगोर को "पूर्वी रहस्यवाद और पश्चिमी साहित्यिक शैली" के मिलन के प्रतीक के रूप में देख रही थी। गीतांजलि में ब्रह्म, आत्मा और त्याग जैसे विषय ईसाई रहस्यवाद के समानांतर लगते थे, जिससे यूरोपीय बौद्धिक वर्ग प्रभावित हुआ। गीतांजलि के कई भावांश जैसे त्याग, ईश्वर की कृपा पर विश्वास, मानवता में ईश्वर का दर्शन, उन्हें बाइबिल की याद दिलाते थे। यह सत्य भी है न्यू टेस्टामेंट जो ईसा मसीह के बाद लिखा गया था उसकी काफी कुछ समानता श्रीमद्भगवद्गीता के प्रवचनों में दिखाई देती है।
यह एक बहस का विषय है कि उनको नोबेल पुरस्कार अंग्रेजों की समीपता के कारण प्राप्त हुआ। परंतु कई विद्वानों की राय में ब्रिटिश साम्राज्य टैगोर जैसे गैर अंग्रेज विद्रोही विचार को और नवयुवकों को बढ़ावा देना चाहता था ताकि वह अंग्रेज़ों के विरोधी, जैसे तिलक या सावरकर के प्रभाव को कम कर सके। टैगोर की भी लेखनी में क्रांति की खुली अपील नहीं थी, बल्कि "सह-अस्तित्व", "शांति" और "आध्यात्मिकता" की बात होती थी।
विवाद तो यहां से उत्पन्न होता है। जब 1911 में, जॉर्ज पंचम भारत आए थे। उसी वर्ष 27 दिसंबर 1911 को कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन हुआ था, जिसमें पहली बार “जन गण मन” गाया गया। चूँकि उस समय जॉर्ज पंचम भारत में थे, इसलिए कुछ लोगों ने यह समझा कि यह गीत उसी राजा के स्वागत में लिखा गया है। हालांकि टैगोर ने स्वयं इनकार किया और 1939 में स्पष्ट रूप से एक पत्र में लिखा। "मैंने जन गण मन किसी जॉर्ज पंचम या किसी ब्रिटिश सम्राट की प्रशंसा में नहीं लिखा। यह गीत भारत के जनगण के उस चित्त की महिमा गाता है जो युगों से चलता आया है।" रवींद्रनाथ टैगोर, 1939, मॉडर्न रिव्यू पत्रिका।
नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने 1943 में आजाद हिंद फौज द्वारा इसे राष्ट्रीय गीत के रूप में गवाया और मान्यता दी। उन्होंने खुद इस गीत का हिंदी अनुवाद करवाया और इसका गायन शुरू करवाया। "नेताजी सुभाष चंद्र बोस" द्वारा अपनाया गया और अनुवादित "जन गण मन" और 1950 में संविधान सभा द्वारा स्वीकार किया गया "जन गण मन" परंतु उनके प्रस्तुतीकरण, भावार्थ की व्याख्या, और राजनीतिक संदर्भ में अंतर है। इसके अतिरिक्त इसके तीन पद निकाल दिए गए।
निष्कर्ष यह निकलता है कि इतिहासकारों की कलम में कितनी अधिक शक्ति होती है कि वे वर्षों तक अपनी गूंज को कायम रख सकते हैं जब तक में उसे पर प्रश्न उठाने वाले पैदा न हो।
अंततः
हम कलम के हैं पुजारी हमारी महत्वता कम नहीं।
हम हिले तो जग हिले हमारी भी सत्ता कम नहीं।।
चोट ही खा जाओगे ठोकर जो मारोगे हमें।
नींव के पत्थर बने हम राह के पत्थर नहीं।।
Reporter - Khabre Aaj Bhi
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