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नवी मुंबई : 21वीं सदी में जल संकट एक वैश्विक चुनौती बन चुका है, विशेषकर खाड़ी देशों के लिए, जहाँ वर्षा की मात्रा अत्यंत न्यूनतम और भूमिगत जलस्रोत सीमित हैं। जलापूर्ति की इस विकट समस्या के समाधान हेतु संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत, बहरीन, कतर और ईरान जैसे देश डी-सालीनेशन यानी समुद्र के खारे पानी को शुद्ध कर पीने योग्य जल में बदलने की तकनीक पर निर्भर हो गए हैं। यह तकनीक जहाँ एक ओर जीवनदायिनी प्रतीत होती है, वहीं दूसरी ओर इसके दीर्घकालिक पारिस्थितिक और समुद्री पर्यावरणीय दुष्प्रभाव अब स्पष्ट होने लगे हैं।
डी-सालीनेशन मुख्यतः दो तकनीकों से होती है। रिवर्स ऑस्मोसिस जिसमें अत्यधिक दबाव से खारे पानी को झिल्लियों से गुजारा जाता है।
दूसरा थर्मल डिस्टिलेशन जिसमें पानी को उबालकर भाप के रूप में इकट्ठा किया जाता है। इन दोनों ही प्रक्रियाओं के बाद एक उपोत्पाद निकलता है। हाइपरसेलाइन ब्राइन यानी अत्यधिक खारे तत्वों से युक्त अवशिष्ट जल। खाड़ी देश इस ब्राइन को पुनः पर्शियन गल्फ या अरब सागर में सीधे फेंक देते हैं।
डी-सालीनेशन प्लांट्स से जो ब्राइन समुद्र में छोड़ा जाता है, वह अक्सर गर्म और खारा होता है। यह स्थानीय समुद्री तापमान को बढ़ा देता है जिससे कोरल रीफ्स, मछलियाँ और अन्य समुद्री जैव विविधता को खतरा होता है। ब्राइन अत्यधिक घना होता है और समुद्र की सतह पर नहीं तैरता, बल्कि नीचे जाकर तली में जमा हो जाता है। इससे वहाँ घुलित ऑक्सीजन की मात्रा घटती है, जिससे तली पर रहने वाले जीव मरने लगते हैं। जब एक ही क्षेत्र में लगातार नमक की मात्रा बढ़ती है, तो समुद्री जीवों का नमक-सहिष्णुता संतुलन बिगड़ता है। परिणामस्वरूप कई प्रजातियाँ या तो विलुप्त हो जाती हैं या उस क्षेत्र को छोड़ देती हैं, जिससे पारिस्थितिक तंत्र का संतुलन बिगड़ता है।
पर्शियन गल्फ अपने उथलेपन और सीमित जलियपरिचक्रण के कारण संवेदनशील क्षेत्र है। इसमें बार-बार अत्यधिक ब्राइन का उत्सर्जन पूरे गल्फ की जैव विविधता को संकट में डाल सकता है। इसके अतिरिक्त डी-सालीनेशन अत्यधिक ऊर्जा-खपत वाली प्रक्रिया है। यह ऊर्जा अक्सर जीवाश्म ईंधनों से आती है, जिससे ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं और जलवायु परिवर्तन की गति तेज होती है।
जिससे स्थानीय मछली उद्योग का विनाश, जो इन देशों के लिए महत्वपूर्ण खाद्य और आर्थिक संसाधन है। कोरल रीफ्स का विलुप्त होना, जो समुद्री पारिस्थितिकी का आधार हैं। समुद्री प्रदूषण में वृद्धि, जिससे अन्य पड़ोसी देशों की समुद्री सीमाएं भी प्रभावित होंगी (जैसे ओमान, पाकिस्तान, भारत तक)। वैश्विक जलवायु परिवर्तन में योगदान, जिससे पूरे विश्व के लिए दीर्घकालिक संकट उत्पन्न हो सकता है। क्षेत्रीय तनाव, क्योंकि सीमावर्ती समुद्री क्षेत्र साझा हैं। यदि एक देश द्वारा अत्यधिक ब्राइन छोड़ा जाता है, तो पड़ोसी देशों को भी नुकसान उठाना पड़ता है। इससे राजनीतिक टकराव बढ़ सकता है।
इसका संभावित समाधान है। ब्राइन को समुद्र में फेंकने के बजाय उसका पुनः उपयोग जैसे सड़क निर्माण, औद्योगिक उपयोग, नमक निष्कर्षण इत्यादि। नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित डी-सालीनेशन प्लांट्स जैसे सौर ऊर्जा आधारित। प्राकृतिक फ़िल्ट्रेशन सिस्टम जिससे ब्राइन को समुद्र में जाने से पहले धीरे-धीरे फिल्टर किया जाए। क्षेत्रीय सहमति और समुद्री कानूनों का पालन। जिसमें खाड़ी देशों को संयुक्त रूप से समुद्री पारिस्थितिकी को सुरक्षित रखने हेतु संयुक्त रणनीति बनानी होगी।
कुल मिलाकर डी-सालीनेशन तकनीक आज जल संकट से जूझ रहे खाड़ी देशों के लिए एक तत्कालिक समाधान अवश्य है, परंतु यदि इसके दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रभावों को अनदेखा किया गया, तो यह ‘समाधान’ स्वयं एक भविष्य का संकट बन सकता है। पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी विकास के बीच संतुलन आवश्यक है। नहीं तो जल के लिए उठाया गया यह कदम, जलचक्र और जीवनचक्र दोनों को प्रभावित कर सकता है।
Reporter - Khabre Aaj Bhi
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