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किंतु स्वयं ही क्यों बिकता हूं ,,
देते सुनते उत्तर प्रश्नों के खो रहा मैं क्यों निजता हूं । आया था बाजार खरीदने किंतु स्वयं ही क्यों बिकता हूं,,
ढोल नगाड़े शहनाई के स्वर में समा गईं सिसकियां,,
याद कर रहा कोई मुझको आकर बता गईं हिचकियां,,
हृदय उछल मुंहको आया बनी पराई अपनी काया,,
नाच नाच खुद थकतीं नहीं पर हाथ थका गईं फिरकियां,,
ढूंढ रहा था रोटी मैं तो स्वयं तवे पर क्यों सिंकता हूं,,
आया था बाजार खरीदने किंतु स्वयं ही क्यों बिकता हूं,,
आकर लगी अचानक मुझको दोष सारा ही बरछी का ज्यादा तुमको मुझको कम दे दोष सारा ही कलछी का,,
ढोता आया अब तक जिसको पीट रहा उसी को धब-धब क्या करता तुम्ही बताओ बांस जो था मैं ही अर्थी का ,,
बीच सभी के रहता फिरभी क्यों अकेले ही पिटता हूं,,
पास किसी के सुख ही सुख कहीं सावन आंखों ढलता है,,
दे प्रकाश भरपूर सबको सूर्य अकेला ही जलता है,,
जो लगे है उपवन सबको मनमोहक सुखदायक इतना,,
पूछ कभी उसके माली से सूखी आतें क्यों मलता है,,
नींद प्रतिक्षारत, गिद्धों को मैं मृतक सा क्यों दिखता हूं,,
वीर बन लड़ा जीवन भर यातनाएं फिर भी थकीं नहीं,,
हार गया था कर्ण उसी दिन जब गायें उससे हंकीं नहीं,,
वात्स्यायन के सूत्र पढ़-पढ़ तुम अश्वमेध तो जीत गए,,
नगरवधुएं बहुत थीं सब क्यों आम्रपाली बन सकीं नहीं,,
होना तो अर्जुन था मुझको क्यों बरबरीक पर टिकता हूं
Reporter - Khabre Aaj Bhi
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