
वर्षों की बीमारी और बढ़ती न्यूरोलॉजिकल समस्या के बाद 28 वर्षीय महिला सेल बेस थेरपी और रिहैबिलिटेशन द्वारा फिर से चलने-फिरने लगी
नवी मुंबई : रिजेनेरेटिव्ह मेडिसिन एक्सपर्ट और स्टेम रेक्स हॉस्पिटल अँण्ड रिसर्च सेंटर के संस्थापक डॉ. प्रदीप महाजन के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने स्जोग्रेन सिंड्रोम से जुड़ी गैंग्लियोन्यूरोपैथी जैसी दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल समस्या से जूझ रही 28 वर्षीय महिला के इलाज में नई उम्मीद जगाई है। मरीज पहले से ऑटोइम्युनो मायोसाइटिस से भी पीड़ित थीं। कई वर्षों तक उन्हें आंखों और मुंह में ज्यादा सूखापन, मांसपेशियों में कमजोरी, थकान, शरीर का संतुलन बिगड़ना, हाथ-पैर सुन्न होना और धीरे-धीरे चलने-फिरने में परेशानी जैसी समस्याएं थीं। उनकी स्थिति धीरे-धीरे इतनी गंभीर हो गई कि वह रोजमर्रा के सामान्य काम भी खुद से नहीं कर पा रही थीं।

मरीज और उनके परिवार ने कई अस्पतालों में डॉक्टरों से सलाह ली। उन्हें बताया गया कि इलाज के विकल्प सीमित हैं और पूरी तरह ठीक होने की उम्मीद कम है। इसके बाद उन्होंने स्टेम रेक्स हॉस्पिटल अँण्ड रिसर्च सेंटर में इलाज शुरू कराया। यहां उनकी बीमारी और स्वास्थ्य की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सेल बेस थेरपी और रिर्हबिलेटेशन प्रोग्राम तैयार किया गया। इलाज के बाद उनकी हालत में उत्साहजनक सुधार हुआ। मांसपेशियों की जकड़न कम हुई, चलने-फिरने में सुधार आया और अब वह सहारे से चल पा रही हैं। इससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी भी बेहतर हुई है।
कोलकाता की रहने वाली तानिया मोडक पाइक को वर्ष 2018 में चलते समय पैर में खिंचाव महसूस हुआ। उन्होंने कई डॉक्टरों से सलाह ली। डॉक्टरों ने बताया कि कोई गंभीर समस्या नहीं है और उन्हें विटामिन मेडिसिन दिए गए, जिससे कुछ समय के लिए राहत मिली। लेकिन करीब दो महीने बाद उनके बाएं पैर में जकड़न शुरू हो गई। कुछ समय बाद यह समस्या दोबारा बढ़ने लगी। वर्ष 2022 में शादी के बाद उनके दाएं पैर में भी जकड़न होने लगी। वर्ष 2023 तक उनकी हालत और बिगड़ गई। उन्हें बहुत ज्यादा कमजोरी होने लगी और शरीर का संतुलन बनाए रखना मुश्किल हो गया। वह सीढ़ियां चढ़ने और रोजमर्रा के काम खुद करने में असमर्थ हो गईं। वह करीब चार वर्षों तक व्हीलचेयर पर निर्भर रहीं। दिसंबर 2023 में वह बेंगलुरु गईं, जहां की गई मांसपेशियों की जांच (मसल बायोप्सी) में स्वप्रतिरक्षित मायोसाइटिस की पुष्टि हुई। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से स्वस्थ मांसपेशियों पर हमला करने लगती है। इससे मांसपेशियों में सूजन और कमजोरी हो सकती है। हालांकि, स्टेरॉयड उपचार के बाद भी उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ और उनकी समस्याएं लगातार बढ़ती गईं।
इसके करीब चार से पांच महीने बाद उन्हें स्जोग्रेन सिंड्रोम का पता चला। इससे आंखों और मुंह में लगातार सूखापन, स्वाद कम महसूस होना और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का कारण स्पष्ट हुआ। मई 2024 में उनका प्लाज्माफेरेसिस उपचार किया गया। इसके अलावा, वर्ष 2025 में उन्हें मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी और रिटुक्सिमैब इन्फ्यूजन की सलाह दी गई। उन्होंने डॉक्टरों की निगरानी में दवाएं भी जारी रखीं। इन उपचारों के बावजूद उनकी हालत लगातार बिगड़ती रही। इसी दौरान उन्हें डॉ. प्रदीप महाजन के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने उनसे सलाह लेने का फैसला किया।
स्टेम रेक्स हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के संस्थापक और रिजेनेरेटिव्ह मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. प्रदीप महाजन ने कहा, “स्जोग्रेन सिंड्रोम एक स्वप्रतिरक्षित बीमारी है। इसमें शरीर की रोगों से लड़ने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से शरीर की अपनी नमी बनाने वाली ग्रंथियों पर हमला करने लगती है। इसके कारण आंखों और मुंह में लगातार सूखापन रहता है। कुछ मरीजों में यह बीमारी केवल आंखों और मुंह तक सीमित नहीं रहती, बल्कि तंत्रिका तंत्र को भी प्रभावित कर सकती है।
इससे गैंग्लियोन्यूरोपैथी जैसी तंत्रिका संबंधी समस्या हो सकती है, जिसमें संवेदना महसूस कराने वाली नसों को नुकसान पहुंचता है। इसके कारण शरीर के कुछ हिस्सों में संवेदना कम होना, शरीर का संतुलन बिगड़ना, चलने में परेशानी, मांसपेशियों में जकड़न और कमजोरी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। धीरे-धीरे मरीज के लिए रोजमर्रा के काम खुद करना भी मुश्किल हो सकता है। दवाएं शरीर की असामान्य प्रतिरक्षा प्रक्रिया को नियंत्रित करने में मदद करती हैं, लेकिन तंत्रिका तंत्र को हुए नुकसान से ठीक होने में समय लग सकता है। इसलिए ऐसे मरीजों के लिए लंबे समय तक पुनर्वास उपचार और उनकी स्थिति के अनुसार व्यक्तिगत उपचार बहुत जरूरी है।
डॉ. महाजन ने आगे कहा, “स्जोग्रेन सिंड्रोम होने का सही कारण अभी पूरी तरह से पता नहीं है। माना जाता है कि इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपनी स्वस्थ ग्रंथियों और ऊतकों पर हमला करने लगती है। कुछ लोगों में आनुवंशिक कारण, हार्मोन में बदलाव और वायरल संक्रमण जैसे बाहरी कारण इस बीमारी के विकास में भूमिका निभा सकते हैं। स्जोग्रेन सिंड्रोम और स्वप्रतिरक्षित मायोसाइटिस दोनों ऐसी बीमारियां हैं, जिनमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपने ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला करती है। कभी-कभी ये दोनों बीमारियां एक ही व्यक्ति में साथ भी हो सकती हैं। कुछ मरीजों में स्जोग्रेन सिंड्रोम के कारण मांसपेशियों में दर्द और कमजोरी हो सकती है, जो मायोसाइटिस जैसी दिखाई दे सकती है। इसलिए शुरुआत में यह पता लगाना मुश्किल हो सकता है कि मरीज को केवल स्जोग्रेन सिंड्रोम है, मायोसाइटिस है या दोनों बीमारियां एक साथ हैं।”
डॉ. महाजन ने कहा, “स्जोग्रेन सिंड्रोम हर 1,000 लोगों में से लगभग 1 से 10 लोगों को प्रभावित कर सकता है और यह आम स्वप्रतिरक्षित बीमारियों में से एक है। यह बीमारी मुख्य रूप से शरीर की उन ग्रंथियों को प्रभावित करती है, जो शरीर में अलग-अलग तरह के तरल पदार्थ बनाती हैं। इनमें लार बनाने वाली ग्रंथियां, आंसू बनाने वाली ग्रंथियां और योनि में नमी बनाए रखने वाली ग्रंथियां शामिल हैं। इसके कारण मुंह, आंखों, योनि, त्वचा और नाक के अंदर सूखापन हो सकता है। मरीज की बीमारी की पुष्टि करने के लिए कई तरह की जांच की गई। इसमें उनके लक्षणों की पूरी जानकारी लेना, कुछ खास स्वप्रतिरक्षित तत्वों की जांच के लिए रक्त जांच, आंखों और लार बनने की प्रक्रिया की जांच तथा जरूरत पड़ने पर होंठ के अंदर मौजूद छोटी लार ग्रंथि की ऊतक जांच शामिल थी। तानिया की बीमारी, पहले किए गए इलाज और रोजमर्रा के काम करने में हो रही परेशानी को ध्यान में रखते हुए उनके लिए एक व्यक्तिगत और शोध पर आधारित पुनर्योजी चिकित्सा तथा पुनर्वास कार्यक्रम तैयार किया गया।”

