

मुस्लिम गुरु सादिक अली से सीखी रावण बनाने की कला को 68 वर्षीय छोटेलाल प्रजापति ने संभाला, छह कारीगरों की टीम के साथ रोज आठ घंटे जुटकर तैयार किया भव्य पुतला
गाजीपुर : उम्र 68 साल, आंखों में हुनर की चमक और हाथों में 43 साल पुरानी विरासत को सहेजने का जज्बा। सुजावलपुर निवासी छोटेलाल प्रजापति के लिए रावण का पुतला बनाना महज कारीगरी नहीं, बल्कि गुरु से मिली कला और परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प है। इसी संकल्प का नतीजा है लंका मैदान में खड़ा 60 फीट ऊंचा दशानन, जिसका मंगलवार रात आठ बजे जिलाधिकारी अनुपम शुक्ला ने बटन दबाकर दहन किया। दस सिरों की जलती आंखें, रावण के संवाद और आतिशबाजी ने लोगों का ध्यान खींचा, लेकिन इस भव्य नजारे के पीछे छोटेलाल और उनकी टीम की ढाई महीने की अथक मेहनत रही।

छोटेलाल प्रजापति छह कारीगरों के साथ एक अगस्त से रावण का पुतला तैयार करने में जुटे थे। करीब ढाई महीने तक रोजाना आठ घंटे काम करके उन्होंने पारंपरिक कारीगरी और आधुनिक तकनीक के मेल से दशानन को भव्य स्वरूप दिया। इस पुतले को बनाने में 70 बांस, साढ़े सात क्विंटल कागज और 100 किलो मैदा का इस्तेमाल किया गया। रावण को राजसी रूप देने के लिए कोलकाता से कपड़ा मंगाया गया। उसके दस सिरों और शरीर की सजावट पर भी विशेष ध्यान दिया गया, ताकि मैदान में खड़ा दशानन दूर से ही आकर्षित करे।
मुस्लिम गुरु से सीखा हुनर, आज भी सहेज रहे विरासत
छोटेलाल की इस कारीगरी के पीछे गुरु-शिष्य परंपरा की अनूठी कहानी है। गाजीपुर में रावण बनाने की कला को कभी हरिशंकरी निवासी मुस्लिम कारीगर सादिक अली ने आगे बढ़ाया था। छोटेलाल ने उन्हीं से यह हुनर सीखा और अब दशकों से इस विरासत को संभाल रहे हैं। करीब 43 साल से चली आ रही यह परंपरा गाजीपुर के दशहरा आयोजन की पहचान बन चुकी है। यह कहानी बताती है कि कला और परंपराएं धर्म की सीमाओं से परे पीढ़ियों को जोड़ती हैं।
70 बांस से बना दशानन, 17 फीट की तलवार और विशाल जूता
इस बार पुतले को खास बनाने के लिए छोटेलाल और उनकी टीम ने सजावट से लेकर तकनीकी इंतजामों तक हर पहलू पर मेहनत की। रावण के साथ 17 फीट लंबी तलवार और 16 फीट का विशाल जूता तैयार किया गया। आंखों में लाइटें लगाई गईं, वहीं दहन से पहले रावण के संवाद सुनाने की व्यवस्था की गई। पुतले के शरीर में करीब 50 हजार रुपये के पटाखे लगाए गए, जिन्होंने दहन के दौरान आतिशबाजी से मैदान को रोशन कर दिया।
हर साल नई भव्यता, कायम है पुरानी कारीगरी
समय के साथ रावण के पुतलों की बनावट और सजावट में बदलाव आया है। अब खास कपड़ों, विशाल आकार की वस्तुओं और आधुनिक तकनीक से उन्हें अधिक आकर्षक बनाया जाता है। इसके बावजूद पुतले का मूल ढांचा तैयार करने और उसे आकार देने में पारंपरिक कारीगरी की अहम भूमिका बनी हुई है। छोटेलाल प्रजापति और उनकी टीम हर साल इसी हुनर के सहारे दशहरे की रौनक बढ़ाते हैं।
मंगलवार रात लंका मैदान में 60 फीट के रावण का दहन केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं बना, बल्कि उस मेहनत का सम्मान भी रहा, जो एक बुजुर्ग कारीगर अपनी पूरी टीम के साथ महीनों तक करता है। जलते दशानन के साथ आतिशबाजी की चमक भले ही कुछ पलों में खत्म हो गई, लेकिन छोटेलाल के हाथों से संजोई गई 43 साल पुरानी विरासत गाजीपुर की सांस्कृतिक पहचान में अपनी जगह बनाए हुए है।

